Lockdown and livelihood | लॉकडाउन और रोज़गार

I live in Srinivaspuri community of Delhi. Every day many people come in search of work to this city where I live. Even my community members and my own family came to this city only in search of livelihood. But because of the lockdown, my family and many people in my community are now trapped here, and that too without employment.
 
The problems in my house are a little less because I still have employment. But not everyone in my community currently has a livelihood source. We all live here in rented houses. And now all the people are returning to their homes. Some people have started walking the distance to their homes [in villages] on foot, some who had little money hired a car or truck, without thinking how long it will take them to reach home, because if they stay in this city then they will suffer from hunger.
 
All these situations would have happened to my family as well if I had no employment. My father is the most troubled of all of us at this time because he has not worked for almost two months. He is at home for the first time, after working for 31 years. It is getting difficult for him to stay at home without work and he does not know if he will get work after the lockdown is over. As my father is not working, I have all the responsibilities of home expenses.
 
I was not really ready to fully take up these responsibilities. I am just 22 years old, dreaming of fulfilling some of my own desires with the money I earn from my new job. But this situation has definitely taught me that what responsibilities of a household are. I have learned the price of lentils and rice. Of course, I have all the responsibilities. But my mother and father are slowly teaching me how I can manage these responsibilities. I might not be able to fulfill my dreams with my money, but I am glad that I am able to give some protection to my family during this difficult time.
 
- Priyanka, FAT team member.
 
मैं दिल्ली के श्रीनिवासपूरी समुदाय में रहती हूँ। मैं जिस सहर में रहती हूँ वहाँ हर रोज कई सारे लोग काम की तलाश में आते हैं। मेरे समुदाय में भी और मेरा खुद का परिवार भी इस शहर में सिर्फ रोज़गार के लिये आया था। लेकिन लॉकडाउन की वजह से मेरा परिवार और मेरे समुदाय के कई सारे लोग यही फँस गए है, और वो भी बिना रोज़गार के।
 
मेरे घर में दिक्कतें थोड़ी कम है क्योंकि मेरे पास अभी भी रोज़गार है। पर मेरे समुदाय में हर किसी के पास इस समय रोज़गार नहीं है। सभी लोग यहां किराये के मकानों में रहते हैं।  और अब सभी लोग अपने घरों को वापसी लौट रहे हैं। कुछ लोग तो अपने घरों की दूरी पैदल ही तय करने लगे हैं, तो कुछ के पास थोड़े-बहुत पैसे थे जिससे गाड़ी या ट्रक से चल दिये, बिना यह सोचे की वह कब तक घर पहुंच पाएंगे, क्योकि अगर वह इस शहर में रहेंगे तो भूख से बेहाल हो जायेंगे। 
 
यह सब परिस्थितियाँ मेरे घर की भी होती अगर मेरे पास रोज़गार नहीं होता। मेरे पापा इस समय हम सब में सबसे ज़्यादा परेशान हैं क्योंकि तकरीबन 2 महीने से उन्होंने काम नहीं किया है। वह घर पर हैं, जबकि 31 साल से वह काम कर रहे है। इसलिए उनका घर पर बिना काम के रहना मुश्किल हो रहा है और उन्हें बिलकुल नहीं पता है की लॉकडाउन खत्म होने के बाद उन्हें काम मिलेगा भी या नहीं। मेरे पिता के काम ना करने से मेरे ऊपर घर के खर्च की सारी जिम्मेदारियाँ आ गयी है। 
 
मैं सच में इन जिम्मेदारियों को पूरी तरह लेने के लिए बिलकुल तैयार नहीं थी। अभी में सिर्फ २२ साल की हु, अपने नए नौकरी के पैसो से खुद की कुछ इच्छाएं पूरी करने के सपने देख रही थी। पर इस परिस्तिथि ने मुझे यह जरूर बता दिया की असल में घर की जिम्मेदारियाँ होती क्या है? दाल-चावल का भाव बता दिया है। बेशक़ मेरे ऊपर सारी जिम्मेदारिया हैं, पर मेरे  मम्मी और पापा मुझे धीरे- धीरे सिखा भी रहे हैं की मैं उन की जिम्मेदारियों को कैसे पूरी कर सकती हूँ। शायद मैं अपने पैसो से अपने सपने पूरा न कर पाऊ, पर ख़ुशी है की अपने परिवार को इस मुश्किल के वक़्त थोड़ी सुरक्षा दे पा रही हूँ।
- प्रियंका, फैट टीम सदस्य।